जहाँ गाये थे खुशियों के तराने
मुक़द्दर देखिये रोये वहीं पर
हुए मस्जिद से गम जूते हमारे
जहाँ से पाये थे, खोये वहीं पर
रेल के डिब्बे में ये किस्सा हुआ
एक बच्चा ज़ोर से रोने लगा
मान ने समझाने की कोशिश की बहोत
उस को बहलाने की कोशिश की बहोत
थक के आख़िर लोरीयाँ गाने लगी
बिजलियाँ कानो पर बरसाने लगी
दस मिनट तक लोरीयाँ जब वो गा चुकी
तिल -मिला कर बोल उठा एक आदमी
"बहनजी , इतना करम अब कीजीये
आप इस बच्चे को रोने दीजीये !"
जिस दिन हुआ पठान के मुर्गे का इंतकाल
दावत की मौलवी की तब आया उसे खाया
मुरदार मुर्ग की हुई मुल्लाह को जब ख़बर
सारा बदन सुलग उठा , गालिब हुआ जलाल
कहने लगे खिलाओगे मम गोश्त ?
तुम को नहीं ज़रा भी शरियत का कुछ ख़याल
मुरदार गोश्त तो शरियत में है हराम
जब तक न जिबाह कीजिए , होता नहीं हलाल
फतवा जब अपना मौलवी साहब सूना चुके
झुंझला के खान ने किया तब उनसे ये सवाल
कैसी है आप की ये शरियत बताईये
बन्दे को कर दिया है खुदा से भी बा -कमाल
अल्लाह जिस को मार दे , हो जाए वो हराम
बन्दे के हाथ जो मरे , हो जाए वो हलाल
Thursday, 31 July 2008
रेल का डिब्बा
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2 comments:
allah jise mare wo haram , aadmi jise mare vo halal , antim ki in laie me bahut kuch chhipa hai
हंसते-हंसते पेट फूल गया, क्या हास्य है!
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