जिहालातो के अंधेरे मिटा के लौट आया |
मै आज साडी किताबे जलाके लौट आया |
वो अब भी बैठी सिसककर रही होगी |
मै अपना हाथ हवा में हिलाकर लौट आया |
ख़बर मिली है की सोना निकल रहा है वहा
मै जिस जमीं पे ठोकर लगाके आया |
Wednesday, 26 November 2008
राहत इन्दोरी -2
उम्मीदवार मई भी हु - 2
नवाजो सिर्फ़ मुजे मेहरबानी फरमाकर |
और वादा करता हु एक एक से कसम खाकर |
के पाँच साल से पहले यहाँ कभी आकर |
बनूँगा बाही जे जहमत न मै किसी के लिए |
उम्मीदवार मई भी हु
मै बेकरार हु मुद्दत से मेम्बरी के लिए
टिकेट मूज़े भी दिला दो अस्सेंब्ली के लिए
टिकेट के बात से गैरत भी बेच सकता हु |
मै खानदान की इज्ज़त भी बेच सकता हु |
बीके तो अपनी शराफत भी बेच सकता हु |
मुजे सुकून है डरकर जिंदगी के लिए |
पॉपुलर मेरठी - 5
एक कणकटे का आज ये एलन ऐ आम है
नेता है हम हमारा तो कुर्बानी काम है
नेता का दावा सुनके मई ये सोचने लगा
कुर्बानी कणकटे की तो हराम है
Wednesday, 15 October 2008
दाढ़ी- महिमा
‘काका’ दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी मुख सून
ज्यों मंसूरी के बिना, व्यर्थ देहरादून
व्यर्थ देहरादून, इसी से नर की शोभा
दाढ़ी से ही प्रगति कर गए संत बिनोवा
मुनि वसिष्ठ यदि दाढ़ी मुंह पर नहीं रखाते
तो भगवान राम के क्या वे गुरू बन जाते
शेक्सपियर, बर्नार्ड शॉ, टाल्सटॉय, टैगोर
लेनिन, लिंकन बन गए जनता के सिरमौर
जनता के सिरमौर, यही निष्कर्ष निकाला
दाढ़ी थी, इसलिए महाकवि हुए ‘निराला’
कहं ‘काका’, नारी सुंदर लगती साड़ी से
उसी भांति नर की शोभा होती दाढ़ी से।
मंत्री-पुत्र
रसगुल्ले सब खा लिए और मिठाई छोड़,
मम्मी से कहने लगा मुन्ना नाक सिकोड़।
मुन्ना नाक सिकोड़, सख्त हैं लड्डू ऐसे,
तुम्हीं बताओ, मम्मी इनको तोडूं कैसे?
‘तोड़ लिए तेरे पापा ने चार विधायक,
तुझसे लड्डू नहीं टूटता है नालायक?’
डाक पर डाका
बजट घोषणा ने किया, पाकिट पर बंबार्ड
सत्तर का है लिफाफा, लिख सकते हो कार्ड
लिख सकते हो कार्ड, बंद हो चिट्ठी कैसे
अंतर्देशी पत्र, दीजिए पचास पैसे
धन्य-धन्य सरकार, डाक पर डाला डाका
काकी को कैसे भेजें लवलैटर काका।