Wednesday 15 October 2008

रिश्वत की रानी

रिश्वत की रानी! धन्य तू, तेरे अगणित नाम,
हक-पानी, उपहार औ, बख्शिश, घूस, इनाम।

बख्शिश, घूस, इनाम, भेंट, नजराना, पगड़ी
तेरे कारण खाऊमल की इनकम तगड़ी।
कहं काका कविराय, दौर-दौरा दिन-दूना,
जहां नहीं तू देवि, महकमा है वह सूना।

जिनको नहीं नसीब थी टूटी-फूटी छान,
आज वहां मना रही कोठी आलीशान।
कोठी आलीशान, भिनकती मुंह पर मक्खी,
उनके घर में घूम रही चांदी की चक्की।

कहं काका कवि, जो रिश्वत का हलवा खाते,
सूखे-पिचके, गाल कचौड़ी-से हो जाते।

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