Wednesday 16 July 2008

ये समंदर क्या होवे है ?

एक दिन की बात है
गर्मी थी
बिजली नही थी
मै अपनों गंजी उतार कर
उससेही पंखा कर रह्यो थे
किचन में मेरी घरादी
मछली पका रह्यो थी
की वो बोली
ऐ जी
सुनते हो ?
ये समंदर क्या होवे है ?
तो मै बोल्यों
की ऐ री
समंदर वो होवे है
जहाँ बड़ी बड़ी मछलियाँ
पानी के अन्दर तैरें हैं
फिर भी न दिक्खें हैं
वहीँ किनारे जनानियां
बे-पर्दा घूमें हैं

तो इस पर कढाई में
मछलियों को जरा हिलाकर
वो बोली
ऐ जी
तुम भी तो घर मा
वैसे ही घूम्ये हो
तो क्या समझूं ?
के जैसे घर मर्दों
की होवे है
जनानियों की समंदर होवे है ?

1 comments:

विनय said...

सुरेन्द्र सहब तो बिना हँसे ही सबको हँसा देते हैं!

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